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टाटा..

                
                                                         
                            टाटा कह वो उड़ चला परदेस पढ़ने को,
                                                                 
                            
दिल पे रख पत्थर हमने हंसकर विदा दी,
छः बरस का हिसाब था, अब बरसों में बदला,
कब लौटेगा बेटा, कब बजेगी शहनाई?

बीस का लड़का गया, छब्बीस का होके आएगा,
मन में एक चाह थी – दादा कहलाने की,
अब शादी का इंतज़ार और लम्बा हो गया,
कब गोद में खिलेगी कोई नन्ही सी परछाई?

छः साल और बीतेंगे, ये सोच-सोच थकता है मन,
रब जाने कल हो या न हो, ये सांसों का बंधन,
इच्छाओं के बोझ तले आदमी जीता है हर पल,
काश इच्छाएं न होतीं, तो कितना हल्का होता जीवन!

-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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3 महीने पहले

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