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प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं, कोई साधन नहीं।

                
                                                         
                            "प्रेम ही साधना है"
                                                                 
                            

यदि दर्द है, दुःख है, तो उसे साधना बना लो,
उसी तपन में ईश्वर को, मजबूती से पकड़ के रखो।
काँटों में ही खिलता है कमल, यही विधान है,
दुःख ही सच्चे भक्त को, ईश्वर से जोड़ता है।

कभी-कभी कुछ छोड़ना पड़ता है, पाने के लिए बड़ा,
मुट्ठी खोलने से ही मिलता है, आकाश का किनारा।
जो पकड़ के बैठे रहे, वो कुछ नया नहीं पाता,
जो छोड़ना सीख जाता है, वही आगे बढ़ जाता है।

ये विश्वास रखो मन में, ये सत्य है सनातन,
प्रेम ही हर सीमा से बड़ा, हर धर्म से महान।
न मंदिर में है, न मस्जिद में, न चर्च में वो बसता,
प्रेम जहाँ है, ईश्वर वहीं, हर दिल में वो दिखता।

प्रेम ही ईश्वर है, यही सार है जीवन का,
प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं, कोई साधन नहीं।

- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 minutes ago

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