प्रकृति का आईना : पेड़, नदी, पहाड़, हवा
प्रकृति का आईना, आज रो रहा है,
मानव की करनी पर, चोट खा रहा है।
हमने कंक्रीट के, जंगल बना लिए,
असली जंगलों को, काट गिरा दिए।
पेड़ कहता है -
मैं खड़ा था तो, छाया देता था,
हर सांस में, जीवन देता था।
तुमने मुझे काट, फर्नीचर बना लिया,
ऑक्सीजन बेच, सिलेंडर बना लिया।
अब पेड़ नहीं कट रहे, सांसें कट रही हैं,
मेरी सूखी टहनियों सी, आसें घट रही हैं।
मैं तो तुम्हारा, बाप समान था,
मुझे काटकर, तूने क्या पाया था?
नदी कहती है -
मैं निर्मल थी, जीवन देती थी,
बहती थी तो, धरती सींचती थी।
तुमने मुझे माँ कहा, देवता बताया,
फिर उसी में कूड़ा, कचरा बहाया।
मन्नत मांगी, प्लास्टिक डाल दिया,
नहा कर पाप धोए, मुझे पापी बना दिया।
मैं कहती हूँ, मैं तुम्हारी माँ हूँ,
मुझे कूड़ेदान, मत बनाओ, मैं कहाँ जाऊँ?
मेरा जल मैला नहीं, तुम्हारा चेहरा मैला है,
जो मुझे गंदा करे, वो मन कितना मैला है।
पहाड़ कहता है -
मैं देवताओं का, घर कहलाता था,
मेरे शिखर पर, संत ध्यान लगाता था।
तुम दर्शन को आए, पर्यटन बना दिया,
होटल की लाइनें, व्यापार बना दिया।
अपना सारा कूड़ा, मुझ पर छोड़ आए,
मेरी छाती पर, बस्तियां बसा आए।
मैं संतुलन हूँ, धरती का ताला हूँ,
मुझ पर बोझ बढ़ा, तो मैं भी हिला हूँ।
तुमने भूकंप को, खुद बुलाया है,
अपने ही हाथों, त्रासदी को लाया है।
हवा कहती है -
मैं निर्मल थी, प्राणों की लोरी थी,
सांसों में घुलती, खुशबू भोरी थी।
तुमने कारखानों से, मुझे घोंट दिया,
धुएँ-धूल से, मेरा जहर बना दिया।
जनसंख्या बढ़ी, गाड़ियाँ बढ़ा दीं,
मेरी नीली चादर, काली बना दीं।
अब हर सांस में, खांसी बसती है,
हवा नहीं, मौत ही, अब चलती है।
सुनो मनुष्य, अब भी संभल जाओ,
पेड़, नदी, पहाड़, हवा को बचा लो।
इन्हें बचाओगे, तभी बच पाओगे,
प्रकृति बचेगी, तभी तुम बच पाओगे।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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