"पंचकोश से परमात्मा तक"
मैं तन नहीं, मैं आत्मा हूँ,
शुद्ध स्वरूप, तेरे आनंद की प्यास हूँ।
जब तक यह ज्ञान हर श्वास में स्थिर न हो,
हे प्रभु, तब तक मुझे देह-अध्यास से छुड़ा कर शुद्ध कर दो।
हे अन्नपते, देह-भाव छुड़ा दो,
अन्नमय कोष को शुद्ध कर दो।
हे प्राणपते, प्राणमय का शोधन कर दो,
इड़ा-पिंगला सम कर, सुषुम्ना जागृत कर दो।
हे मनस्पते, मनोमय को वश में कर दो,
संकल्प-विकल्प मिटाकर, चित्त को अंतर्मुखी कर दो।
हे ज्ञानप्रद, विज्ञानमय का आवरण भंग कर दो,
अहंकार का विक्षेप मिटाकर, विवेक-वैराग्य उदय कर दो।
हे आनंद-स्वरूप, आनंदमय में स्थित कर दो,
यही मेरा सत्य स्वरूप है, मुझको तुझमें लीन कर दो।
न बूंद रहे, न सागर की दूरी,
भेद मिटे, भक्ति रहे अभेद की पूरी।
यह चेतन तेरे आनंद में स्थित सदा रहे,
ओ३म् शम्, ऐसी कृपा कर दो, यही वरदान रहे।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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