अनमोल है
मां की ममता,
जीवन हम सबका
उसी से चलता।
अंक में उसके
शिशु जब पलता,
हर किसी को
वह प्यारा लगता।
संस्कारों से उसके
हमारा जीवन ढलता,
सृष्टि में उसे
कोई जीव नहीं ख़लता।
कोमल हृदय उसका
मोम-सा पिघलता ,
दीपक आशाओं का
उसमें अनवरत जलता।
बाधाओं का तूफां हमारा,
उसकी नज़र भर से टलता।
बागबां हमारा लहलहा कर ,
दुआओं से उसकी फलता।
चैन की हमारी नींदों में ,
पल-पल जैसे उसका जगता।
अंधेरा हमारे जीवन का ,
उसके देखने - भर से भगता।
शत्रु जैसे हमारा "विचित्र"...
सामने उसके, हाथ अपने मलता।
अपरिमित-असीम मां की है ,
स्नेहिल-अखिल अपनी क्षमता।
रोम-रोम में उसके अपनी ,
रची-बसी है पूरी अक्षुण्ण समता।
कर्तव्य पथ का उसका अपना ,
चक्र हार कर कभी न थमता।।
__जे.पी. साधुराम जी गुर्जर "विचित्र" अमरसरिया, जयपुर।
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