"मैं देह नहीं हूँ"
हे परमात्मा! सुन लो विनय हमारी,
मैं देह नहीं हूँ, मैं तो आत्मा हूँ सारी।
शुद्ध स्वरूप हूँ, परमानंद का प्यासा,
जब तक ज्ञान ये स्थिर न हो, दो ऐसा दिलासा।।
देह-अध्यास से मुक्त करो, छूटे देह का भाव,
अन्न शुद्ध हो, मिटे मोह का चाव।
अन्नमय कोष की, जड़ ग्रंथि को तोड़ो,
मैं देह नहीं, यह बंधन मेरा छोड़ो।।
प्राणमय कोष का, शोधन अब कर दो,
इड़ा-पिंगला सम हों, सुषुम्ना भर दो।
साँसों का स्पंदन, लयबद्ध कर दो,
ऊर्जा का पथ निर्मल, प्रबुद्ध कर दो।।
मनोमय की चंचल, ग्रंथि को भेदो,
संकल्प-विकल्प का, झगड़ा सब खेदो।
चित्त को एकाग्र, अंतर्मुखी कर दो,
भटकाव मिटा, मन को सुखी कर दो।।
विज्ञानमय के अज्ञान का, आवरण भंग करो,
"मैं करता हूँ" इस अहं का, विक्षेप भंग करो।
विवेक जगे, वैराग्य का उदय कर दो,
सत्य-असत्य का बोध, हृदय में भर दो।।
अब आनंद की भी, कोई आस न रहे,
आनंदमय कोष का भी, अतिक्रमण हो रहे।
न बूँद रहूँ, न सागर की दूरी रहे,
जीव-भाव मिटे, बस एक नूरी रहे।।
भेद मिटे सारा, भक्ति अभेद रहे,
मैं तुझमें, तू मुझमें, बस यही भेद रहे।
यह चेतन सदा, तेरे आनंद में स्थित रहे,
हे नाथ! बस इतनी सी कृपा दृष्टि रहे।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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