"जीते जी मोक्ष"
मुक्ति मरने पर नहीं, जीते जी पायी जाती,
जीवनमुक्त की दशा, सबसे न्यारी बतायी जाती।
न राग उसे बाँधे, न द्वेष सता पाए,
सुख-दुख के झूले में, वो सम ही रह जाए।।
लोक-परलोक की चिंता, उसके लिए व्यर्थ है,
न स्वर्ग की चाह उसे, न नरक का अर्थ है।
भूख-प्यास लगे देह को, वो जानता है,
पर आत्मा अछूती है, यह मानता है।।
भीड़ में भी एकाकी, एकांत में भी पूरा,
जैसे कमल जल में रहकर, जल से रहता दूरा।
काम करे संसार का, पर लिप्त न हो पाए,
जैसे हवा छू ले सब, पर कहीं बंध न जाए।।
ऐसा ज्ञानी पुरुष, ही जीवनमुक्त कहलाता,
जीते जी मोक्ष का, आनंद वो पाता।
अष्टावक्र ने जनक को, यही रूप दिखाया,
राजा होते हुए भी, मुक्त होना सिखाया।।
-- जगदीश प्रसाद
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