सुनो, जौहर केवल मरना नहीं था,
सवाल देह की गरिमा का था, गहना नहीं था,
वो प्राणों का सौदा, सस्ता नहीं था,
वो आत्मसम्मान का, रस्ता वही था।
मुगलों की सेना जब, द्वार पर आई,
तलवारें चमकीं, ललकार पर आई।
पुरुषों ने केसरिया, बाना पहना था,
रणभूमि में मरना, ठाना पहना था।
भीतर दुर्ग के, प्रश्न दूसरा था,
जीवन-मरण नहीं, अस्मिता का था।
जीवित रहना यदि, अपमान की कीमत,
तो मृत्यु ही बेहतर, सम्मान की कीमत।
कोई पूछे क्यों चुनी, ऐसी त्रासद मृत्यु,
विष भी था, तलवार भी थी, सरल थी मृत्यु।
पर विष से मरे तो, देह बच जाती,
तलवार से मरे तो, देह बच जाती।
पीछे छूटी देह भी, शत्रु पा जाता,
मृत देह पर भी वो, उन्माद मनाता।
इसलिए वीरांगना ने, अग्नि को चुना,
तन को राख किया, मन को न झुका।
अग्नि को सौंपी देह, अस्मिता नहीं,
प्राण त्यागे उसने, स्वाभिमान नहीं।
राख हुई देह, पर आन रही,
उसी राख में आज भी, शान रही।
एक तरफ रण में, पुरुष लड़ रहा था,
दूसरी तरफ अग्नि में, गौरव गढ़ रहा था।
एक ने रक्त से, धरती को सींचा था,
एक ने अग्नि से, गगन को खींचा था।
यही क्षत्रिय चेतना, यही राजपूत गौरव,
जहाँ नारी भी रण में, बन जाती है सौरव।
साम्राज्य मिट गए, मुगल वैभव खो गया,
धूल में दब गया, उनका सब सो गया।
पर चित्तौड़ की वह, अग्नि आज भी जलती है,
जौहर की गाथा, आज भी चलती है।
जिसे तुम मृत्यु कहो, वो अमरता थी,
अग्नि नहीं, वो तो, स्वाभिमान की कथा थी।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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