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जिन रिश्तों को ठुकराया, उनसे नज़र चुराते हैं

                
                                                         
                            डॉलर वाला आईना
                                                                 
                            

पति-पत्नी दोनों साहब, पैकेज तीस लाख है,
सुबह आठ से रात ग्यारह तक, काम का ही चाक है।
रिश्ते-नाते छूट गए, बस करियर का नशा है,
भीड़ में भी तन्हा हैं, घर में सन्नाटा पसरा है।

बड़ी नौकरी छोड़ न सकें, मजबूरी भारी है,
अपना ही बच्चा पाल न सकें, ऐसी लाचारी है।
फुल-टाइम आया लाते हैं, एजेंसी से भाई,
उसी के हाथ में सौंप दी, अपने जिगर की परछाई।

बच्चा दादा-दादी न जाने, मामा-मौसी कौन है,
उसके लिए तो बस एक ही रिश्ता, आया आंटी मौन है।
आया ही नहलाती-खिलाती, टिफिन वही बनाती,
कैब में बिठा स्कूल भेजे, गोद में सुलाती।

रोए तो टीवी दिखा दे, लोरी अधूरी है,
माँ-बाप की ममता में, अब कितनी दूरी है।
टीचर जो कहे वही सच, वही भगवान है,
देसी खाना छूट गया, पिज्जा-बर्गर शान है।

वीकेंड पर मॉल ही पिकनिक, संडे ही परिवार है,
समय भागा, बच्चा कॉलेज पहुँचा, बदला व्यवहार है।
कॉन्वेंट की पढ़ाई ने सिखाया, भारत पिछड़ा है,
विदेश ही सच्चा है, यही मन में गढ़ा है।

पढ़ने गया विदेश तो वहीं का हो गया,
नए रंग में रंग गया, वहीं खो गया।
मॉम-डैड से रिश्ता अब, सिर्फ रुपया-पैसा है,
वीडियो कॉल पर हाय-हेलो, बस इतना-सा है।

वहाँ नौकरी मिली, वहीं शादी रचाई,
माँ-बाप के सारे सपने, वहीं छोड़ आई।
जिस बेटे पर था गुमान, वो करियर में खो गया,
बुढ़ापे में माता-पिता का, आँगन सूना हो गया।

जिन रिश्तों को ठुकराया, उनसे नज़र चुराते हैं,
इतना कमा कर क्या किया, खुद से ही शर्माते हैं।
हाथ-पैर ढीले हुए, दाँत टूटे, कमर झुकी,
आँखों पर मोटा चश्मा, कानों में धुंध रुकी।

बेटा लंदन में, बेटी न्यूयॉर्क में आबाद है,
इधर माँ-बाप का जीवन, वृद्धाश्रम में बर्बाद है।
सात समंदर पार डॉलर में बेटा उलझा है,
पिता की चिता को कंधा, पड़ोसी ने पकड़ा है।

ऑनलाइन ही रह गया, सारा लाड़-दुलार है,
दुनिया छोटी हो गई, पर रिश्ते बीमार हैं।
काशी के घाट को छोड़, सिडनी आखिरी कहानी है,
आँखों में माँ के आज, बस खारा पानी है।

सोचो, बच्चे किसलिए? विदेश की सेवा के लिए?
या अपने बुढ़ापे की लाठी, मेवा के लिए?
तेरे डॉलरों से मेरा, एक रुपया भारी है,
सूखी रोटी में भी सुखी, अपनी संस्कृति न्यारी है।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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