अहंकार का छल यही, सबसे बड़ी वंचना है,
दोष सदा पर-पक्ष में, यही उसकी रचना है।
आत्म-मोह का आवरण, आँखों पर पड़ जाता है,
अंतर्दृष्टि ढक लेता, सत्य न दिख पाता है।
जब मन कुहासे में घिरा, भ्रम में भटक जाता है,
आत्म-समीक्षा का दीया, खुद ही बुझ जाता है।
अपने दोषों से विरत, जग को दोषी कहता है,
बाहर खोजे खोट सदा, खुद से दूर ही रहता है।
यह भ्रांति नव-सृजित जो, पथ से तुम्हें हटाती है,
आत्म-शुद्धि, ब्रह्म-बोध से, कोसों दूर ले जाती है।
जब तक इस माया-जाल को, तुम काट नहीं पाओगे,
समत्व और प्रौढ़ता को, कभी पा नहीं पाओगे।
छोड़ो यह अभिमान तो, भीतर प्रकाश होगा,
आत्म-दर्शन के पथ पर, फिर सच्चा विकास होगा।
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