याद है तुझे बचपन की यादें,
पूछा मेरे मित्र ने माल्टा खाते-खाते।
कंधों पर सपने, आँखों में सवाल,
छोटा-सा जीवन, बड़े-बड़े ख्याल।
नमक के साथ खाते-खाते पूछा,
“एक बात बताना, मुझे पसंद नहीं झूठा।
किसने लिखी भाग्य की रेखा,
किसने जीवन का लेख लिखा?”
मैं हँसा और बोला—“कौन जाने,
लिखी किसने ये किस्मत के अफसाने।
पर मैंने ये सीखा, ये जाना,
हर पन्ना नहीं होता पुराना।”
वो बोला—“क्यों हँसता है कोई जन्म से,
क्यों कोई रोता रहता हर गम से?
किसी के घर में खुशियों का मेला,
किसी के हिस्से में क्यों दर्द अकेला?”
मैंने उसे सामने पहाड़ दिखाए,
टेढ़े-मेढ़े खेत-खलिहान दिखाए।
“ये ऊँचे पहाड़ किस्मत के पाषाण नहीं,
ये रास्ते बताते हैं—ज़िंदगी आसान नहीं।”
मित्र बोला—“तो ग्रह-नक्षत्र क्या है?
पिछले जन्मों का ये डर क्या है?
जो चाँद समंदर में ज्वार उठा सकता है,
क्या वो मन में भी तूफान जगा सकता है?”
मैं बोला—“तेरी हाँ में हाँ मिलाऊँ कैसे?
जो फैसला मेरा है, तुझे समझाऊं कैसे?
तारे तुझे राह दिखा सकते हैं यार,
पर चलना होगा अपने पैरों से हर बार।”
वो फिर बोला—“किससे कब मिलना होगा,
किसके संग जीवन का रिश्ता होगा?
किसके घर में बारात सजेगी,
कौन मुझे प्राणप्रिय कहेगी?”
मैं बोला—“कुछ रिश्ते ऊपर से आते हैं,
कुछ हम अपने कर्मों से बनाते हैं।
कुछ अचानक जीवन में आते हैं,
कुछ उम्र भर साथ निभाते हैं।”
फिर उसने पूछा—“तूने ऐसा क्या किया,
जो भाग्य ने तेरा साथ दिया?”
मैं मुस्कराया, बोला—“मुझे भी झुकना पड़ा,
हर मोड़ पर मुझे रुकना पड़ा।
जो मैंने चाहा, वो कभी मिला नहीं,
जो मिला, वो भी आसान था नहीं।
कभी रास्तों ने मुझे रोक लिया,
कभी अपने ही कदमों ने टोक दिया।”
मित्र बोला—“तो भाग्य कुछ नहीं?”
मैं बोला—“नहीं, ऐसा भी नहीं।
कुछ राहें हमारे हाथ में नहीं होतीं,
कुछ मंजिलों से हमारी बात नहीं होती।”
“जो सामने है, उससे क्यों भय करें?
हमें कहाँ चलना है, ये हम तय करें।
बीजों को खेतों तक ले जाना होगा,
धरती सूखी है तो पानी भी लाना होगा।”
मित्र क्षण भर चुप रहा, फिर मुंह खोला।
माल्टा के छिलके फेंके, फिर बोला—
“तो क्या इंसान अपना भाग्य लिखता है?
न्याय-अन्याय, सौभाग्य-दुर्भाग्य लिखता है?”
मैंने कहा—“पूरा नहीं, कुछ हिस्सा लिखता है,
किस्मत रूठी हो, तो कर्म किस्सा लिखता है।”
तभी दूर पहाड़ पर सूरज ढला,
काली नदी के जल ने रंग बदला।
मैंने कहा—“देख, दिन भी ढलता है,
हर अँधेरा फिर से सुबह में बदलता है।”
मित्र ने पूछा—“तेरा अंतिम उत्तर क्या है?
ये तो सागर भी नहीं, महासागर क्या है?”
मैं बोला—“उत्तर शायद एक नहीं,
कुछ भी अधूरा या मुकम्मल नहीं।
भाग्य परिस्थिति का दूसरा नाम है,
नित्य कर्म ही मनुष्य की पहचान है।”
“नियति जो देगी, उसे स्वीकार करेंगे,
बदल सकता है जो, उसे बदल देंगे।
जो छिन गया, उसका मातम नहीं करेंगे,
जो बचा है, उसी से जीवन गढ़ेंगे।”
हम दोनों लौट पड़े फिर उसी राह में,
लड़कपन में चले थे जहाँ साथ में।
मैंने पीछे मुड़कर पहाड़ों को देखा,
बचे-खुचे कठोर इंसानों को देखा।
फिर समझ आया—जीवन क्या है?
नियति छोड़ो, कर्म करो—चिंतन क्या है?
अब कोई पूछे—“किसने भाग्य लिखा?”
मैं कहूँगा—
“जिसने भी लिखा, आधा लिखा,
बाकी आधा तो अभी बाकी है यार।
भाग्य भरोसे बैठे—ये तो गुस्ताखी है यार।
कलम अभी मेरे हाथ में है यार,
और अभी तू भी तो मेरे साथ में है यार!”
- जगदीश चंद्र कापड़ी
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