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दिल के रास्ते दिमाग की उपज

                
                                                         
                            किस क़दर सौदा हुआ था मेरे जज़्बातों का
                                                                 
                            
मेरा हर एक अश्क गवाह है मेरे हालातों का
क़ातिल मांग रहे थे साक्ष्य हमसे बेगुनाही का
चमन को लूटकर दावा है उनका रहनुमाई का

इतिहास की कालिख मिटा नहीं सकते
हम गुज़रे हुए कल पर आंसू बहाने से
आने वाला कल को संवारने की खातिर
हमें आज लड़ना ही पड़ेगा सारे ज़माने से
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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