शादी-ब्याह का न्योता आया,
मैं भी सूट-टाई में छाया।
मन में बोला.."सब्र करूँगा,
भीड़ से थोड़ा दूर रहूँगा।"
खचाखच भरे थे खाने वाले,
नसीब नहीं हो रहे थे निवाले।"
थोड़ा सब्र किया, मुस्काया,
खाली पेट पे गीत सुनाया।
जब पहुँचा मैं उठाने थाली,
बर्तन बोले.."हम तो खाली!"
प्लेट हँसी, चम्मच ने चिढ़ाया
"देर से आया, कुछ न पाया!"
सब्ज़ी ग़ायब, रोटी भागी,
दाल तली में चुपचाप जागी।
मिठाई बोली.."Bye रे भैया,
हम तो निकले उठा के शय्या!"
पापड़ ने भी आँख दिखाई,
सलाद ने हर बात छुपाई।
कढ़ी चिल्लाई.."अब पछताओ,
सब्र किया, तो भूखे जाओ!"
मैंने की सब्र की ख़ूब दुहाई,
पर थाली ने पंक्ति सुनाई
"जो पहले आये, पेट भराये,
बाक़ी सब्र में आँसू बहाए!"
अब जो शादी में जाना होगा,
पहले थाली उठाना होगा।
नहीं तो सब्र के फल में भाई,
बस खाली भगौना खाना होगा!
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