दोस्तों मेरा गाँव अब बन गया है शहर।
यहाँ की आबोहवा में घुल गया है ज़हर।।
आज अंधाधुंध वृक्ष कट रहे हैं मेरे गाँव में।
अब कैसे बैठेंगे हम उनकी ठंडी छाँव में।।
गाँव में बन गए हैं ऊँचे-ऊँचे कंक्रीट महल।
अब पहले जैसी नहीं है गाँव में चहल-पहल।।
गाँव में लग रहा है प्लास्टिक कचरे का अंबार।
गाँव में भी झेलनी पड़ रही है प्रदूषण की मार।।
इक्का-दुक्का ही मिलेंगे गाँव में संयुक्त परिवार।
सभी के बनते जा रहे हैं अलग-अलग घर-बार।।
चौपाल की रौनक आजकल हो गई है छूमंतर।
गाँव और शहर में आज नहीं रहा है अंतर।।
आजकल लोग मोबाइल में रहते हैं व्यस्त।
सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में हैं मस्त।।
बढ़ती जनसंख्या ने गाँव में बरपा दिया है कहर।
मेरा गाँव अब गाँव नहीं रहा बन गया है शहर।।
- इस्लाम अली
हरिद्वार, उत्तराखण्ड
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