भौतिकता एवं लौकिकता से,
अब पूर्ण रूप से ऊब गया है,
हे नंदलाल मेरी आँखों के तारे,
मनवा तेरी भक्ति में डूब गया है।
हे कृष्ण मुरारी मेरे उर के चैन,
आ मेरे मन मंदिर में डाल ले डेरा,
क्यों न मैं पल-पल निहारूं तुझे,
तजकर मोह-माया और मेरा मेरा।
हे गिरिधर नित रखना मेरा ध्यान,
सदा बनाए रखना अपनी कृपा दृष्टि,
मैं इस चंचल मन को एकाग्र कर सकूँ,
तू इस सावन कर दे ध्यान की वृष्टि।
-इस्लाम अली
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