हां प्रीत निभाना , रीति रही है,
पर सच्चा अगर , मनमीत नहीं है ,
मन के बंधन ,मन से जुड़ते है ,
ये बंधन , जंजीर नही है ।
तुम ही निभाओ , रिश्ता तो फिर,
झूठा रिश्ता है , वो प्रीत नही है ।
जो ना छेड़े , मन के तार तो वो
गीत है बस , वो संगीत नहीं है ।
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