आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुझको सब अपना - अपना लगता है

                
                                                         
                            झूठ बोलते हैं ऐसे कि , सच्चा लगता है ।
                                                                 
                            
खेल तुम्हारा समझ रही हूं, खेल तुम्हारा कच्चा लगता है ।
महीनो बाद हंसी हूं, तो लगता है ,
हंसकर अच्छा लगता है ।
कोई साथ चला हो तो , सफर अच्छा लगता है ,
अकेले का सफर , बस रस्ता लगता है ।
दुश्मन का भी हो तो , प्यार करूं मैं ,
मुझको बच्चा बस बच्चा लगता है ।
शूल - सुमन जो भी मिले हैं ,
मुझको सब , अपना रस्ता लगता है ।
उसकी पूजा करके , मांगू कुछ तो ,
मुझको ये सौदा , सस्ता लगता है ।
खुशियां- दुख , वो जो भी देते हैं ,
मुझको सब अपना - अपना लगता है ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर