आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेहिसाब मोहब्बत

                
                                                         
                            हम नावाकिफ थे जिस इश्क़ से
                                                                 
                            
उस इश्क़ को बेबाक कर बैठें,
मुद्दतों तक देखा तस्वीर तेरी और
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठें।१।

होकर मशरूफ तिलावतों में
हम तुझे दुवाओं में याद कर बैठें,
हां हुई हमसे खता ये की
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे।२।

हम तेरे संग ता-उम्र जीने-
मरने का हिसाब कर बैठे,
हिसाब करते-करते हम
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे।३।

इश्क इतना हसीन है या तुम
हम खुद से ये सवाल कर बैठे
जवाब तो ना मिला लेकिन
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे।४।


तुझे पाकर हम अपना,
मुकम्मल हर ख्वाब कर बैठे,
हुई जो गुफ्तगू तुझसे एक दफा तो
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे।५।

अपने दिल की हर बेजार गलियों को
हम तेरे इश्क से गुलजार कर बैठे,
ना जाने कब से हम
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे।६।

हम खुदा से तुझे पाने की हर-
रोज हर दफा फरियाद कर बैठे,
नादान थे नादान हैं हम शायद इसलिए
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे।७।

हम तेरी हर नादान गुस्ताखी को
मुस्कुरा के माफ कर बैठे,
चलो आज हमने भी माना हम
तुझसे मोहब्बत बेहिसाब कर बैठे ।।८।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर