नए दौर का ये कैसा फैशन चल रहा है,
सादगी का दीप बुझा, दिखावा चल रहा है।
रूप रंग से अधिक अब ब्रांड का मान है,
मन की गहराई से अधिक, बाहरी पहचान है।
वस्त्रों में नहीं अब मर्यादा का श्रृंगार,
आडंबर की आँधी में उड़ता है संस्कार।
चमकते वस्त्रों में छिपा है शून्य का भार,
हँसी में खोया सा लगता है मन का संसार।
भाषा में भी अब अजनबीपन का रंग है,
अपनी जड़ों से दूर होता हर एक अंग है।
शब्दों में अंग्रेज़ी का जब होता विस्तार,
हिंदी की मधुरता होती जाती लाचार।
मोबाइल के पर्दों में सिमटी है जिंदगी,
संबंधों की ऊष्मा में आ गई है मंदी।
सेल्फी के जाल में उलझा हर एक प्राण,
स्वार्थ की धूप में सूख रहा अपनापन महान।
फैशन अगर हो, तो संस्कृति का संग हो,
आधुनिकता में भी परंपरा का रंग हो।
नवता का स्वीकार हो, पर हो विवेक साथ,
तभी सजेगा जीवन, तभी खुलेगा विकास-पथ।
नए दौर का फैशन तब सुंदर कहलाए,
जब भीतर का सौंदर्य भी बाहर झलक जाए।
—सौरभ त्रिपाठी 'प्रकृति लेखक'
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