आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नए दौर का फैशन

                
                                                         
                            नए दौर का ये कैसा फैशन चल रहा है,
                                                                 
                            
सादगी का दीप बुझा, दिखावा चल रहा है।
रूप रंग से अधिक अब ब्रांड का मान है,
मन की गहराई से अधिक, बाहरी पहचान है।

वस्त्रों में नहीं अब मर्यादा का श्रृंगार,
आडंबर की आँधी में उड़ता है संस्कार।
चमकते वस्त्रों में छिपा है शून्य का भार,
हँसी में खोया सा लगता है मन का संसार।

भाषा में भी अब अजनबीपन का रंग है,
अपनी जड़ों से दूर होता हर एक अंग है।
शब्दों में अंग्रेज़ी का जब होता विस्तार,
हिंदी की मधुरता होती जाती लाचार।

मोबाइल के पर्दों में सिमटी है जिंदगी,
संबंधों की ऊष्मा में आ गई है मंदी।
सेल्फी के जाल में उलझा हर एक प्राण,
स्वार्थ की धूप में सूख रहा अपनापन महान।

फैशन अगर हो, तो संस्कृति का संग हो,
आधुनिकता में भी परंपरा का रंग हो।
नवता का स्वीकार हो, पर हो विवेक साथ,
तभी सजेगा जीवन, तभी खुलेगा विकास-पथ।

नए दौर का फैशन तब सुंदर कहलाए,
जब भीतर का सौंदर्य भी बाहर झलक जाए।
—सौरभ त्रिपाठी 'प्रकृति लेखक'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर