मुस्कुरा कर जो ज़हर देते हैं, वो कमाल का हुनर रखते हैं,
ताने कसते हैं मज़ाक कह कर, खुद को बड़ा ज़हीन समझते हैं।
पीठ पर वार, लबों पे दुआ, ये हुनर तुमने सीखा कहाँ से है?
जो गिरा कर दूसरों को खुश हो, वो समझता खुद को ख़ुदा क्यूँ है?
तुम्हारी चालाकी को हम नासमझी नहीं, शराफ़त समझते हैं,
तुम जिसे अपनी जीत कहते हो, उसे हम तुम्हारी गिरावट समझते हैं।
घमंड न कर अपनी इस ओछी सियासत पर ऐ 'नासेह',
वक़्त का तराज़ू जब तोलेगा, तो तुम्हारी औक़ात मज़ाक बन जाएगी।
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