हाँ, मैं एक शिक्षिका हूँ,
ज़िम्मेदारी और सपनों की बहती सरिता हूँ।
सुबह की पहली किरण के साथ मेरा दिन ढलता है,
घर और स्कूल के बीच एक नया स्वप्न पनपता है।
हाथों में चूल्हे की आँच और फिर चॉक की धूल होती है,
थकान चाहे जितनी हो, स्कूल आकर हर बात रूल होती है।
दौड़ती हूँ सुबह कि डिब्बा भी समय पर सज जाए,
और भागती हूँ कि स्कूल की पहली घंटी न बज जाए।
एक तरफ मेरा अपना घर, मेरा छोटा सा परिवार है,
दूसरी तरफ पूरी क्लास, जिससे मुझे उतना ही प्यार है।
दोनों के बीच समझौते की एक महीन डोर बुनती हूँ,
मैं अपनी ख्वाहिशों से पहले, सबकी ज़रूरतें चुनती हूँ।
कम तनख्वाह में भी जीवन की चादर को तनकर तानती हूँ,
हाँ, मैं संघर्ष के हर एक मोड़ को बख़ूबी जानती हूँ।
पर जैसे ही पहुँचती हूँ अपनी उस पावन चौखट पर,
भूल जाती हूँ हर उलझन, हर शिकन अपने माथे पर।
जब देखती हूँ बच्चों के चेहरों पर वो गहरा सुकून,
दौड़ने लगता है रगों में फिर से वही पुराना जुनून।
उनकी आँखों की चमक मेरी हर थकान को मिटा देती है,
वो निश्छल हँसी मुझे मेरी वास्तविक कमाई दे देती है।
अपने हिस्से की धूप, मैं बच्चों के उजालों में ढालती हूँ।
जब क्लास में कदम रख, मैं अपनी कलम उठाती हूँ।
यह कलम नहीं, यह मेरी रीढ़ है, मेरा मान है,
ज़िंदगी के थपेड़ों के बीच, यही मेरा आसमान है।
नहीं चाहिए मुझे महलों की झूठी चकाचौंध,
मैं तो बस बच्चों के चेहरों पर सुकून की सुबहें चुनती हूँ,
मैं कागज़ पर सिर्फ अक्षर नहीं, बच्चों की तक़दीर लिखती हूँ।
हाँ, मुझे नाज़ है कि मैं एक शिक्षिका हूँ,राष्ट्र का आधार लिखती हूँ,
मेरी कलम ही मेरा स्वाभिमान है, मैं कल का भविष्य बुनती हूँ,कल का भविष्य बुनती हूँ।
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