आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

करता प्रणाम सिंह शावक भगत को मैं

                
                                                         
                            करता प्रणाम सिंह शावक भगत को मैं, बाल्यकाल में बँदूकें खेतों में जो बोते थे।
                                                                 
                            
मातु भारती की बेड़ियों को देख करके जो, हृदय द्रवित कर छुप छुप रोते थे।
लाला लाजपत राय हत्या का ले प्रतिशोध, फेंका बम असेंबली में गोरे नींद सोते थे।
तेइस बरस आयु जीकर के फाँसी चढ़े, जिन्हें देख के कसाई नयन भिगोते थे।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर