आज विजय दिवस है पुण्य कर्म का
अधर्म पर विजय धर्म का
पाप में है नीहित पराजय
पुण्य को आज मिली थी विजय।
रावण मेघनाद कुम्भकरण
किये शास्त्र का गहन अध्ययन
पांडित्य गुण था उनमें परिपूर्ण
फिर भी रहे वे अपूर्ण।
रावण अपने शास्त्र ज्ञान से
शिव ताण्डव स्तोत्र गान से
किया भगवान शिव को प्रफुल्लित
त्रिलोक विजयी पद से हुआ सम्मानित।
मेघनाद का गर्जन तर्जन
ब्रह्माण्ड में लाया कम्पन
जीत न सका उससे कोई
इन्द्रजीत था वह इन्द्रविजयी।
कुम्भकरण का देख पराक्रम
देवलोक में मचा हड़कम्प
शरण लिया सब मां सरस्वती का
मिला वरदान उसे निद्रादेवी का।
अपार शक्ति ले कुम्भकरण
सोता रहा हर पल हर क्षण
क्षण भर भी नींद उसकी खुलती
हो भयभीत धरती थर थर कांपती।
शूरवीर थे तीनों त्रिलोकविजयी
दर्प शक्ति उनमें भर आई
अस्त्र शस्त्र संग ले कुठार
राम लखन पर किया प्रहार।
राम लखन मनुष्य शरीर ले
सत्य कर्म का धनुष तीर ले
आए समक्ष उनके निर्भीक
अब चला बाण जो था न्याय प्रतीक।
अदभुत शस्त्र बल दिखाया रावण
संग आया भ्राता कुम्भकरण
पर विफल हुआ उसका शस्त्र बल
क्योंकि नहीं था पास उसके सत्यकर्म बल।
शस्त्र सामर्थ भी तभी चमकता
सत्य कर्म संग उसके होता
हुआ सत्य से रावण पराजित
समक्ष राम के गिरा मूर्छित।
गए सुरधाम रावण कुम्भकरण
काम न आया शास्त्र अध्ययन
विजयश्री वर सिर्फ सत्य को मिलता
भगवान श्री राम हुए विजेता
भगवान श्री राम हुए विजेता।
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