यह कहर कैसा बादलों का
आ गई आपदा प्रकृति में
टूट गया तटबन्ध बाँध का
हलचल मची शहर बस्ती में ।
ले तरंगवेग संग जलमृदा
आया सरिता में उफान
हो भयानक जलमग्न किया
गंगा,कोसी,कमला-बलान ।
हुआ जलप्लावित नगर नगर
नींद उड़ी सब जाग रहे
त्राहि त्राहि मची जन जीवन में
घरवार छोड़ सब भाग रहे ।
मिले न भोजन वस्त्र आवास
संग मिले न कोई सन्तोष आस
यह घनघोर विपत्ति कुदरत कहर
है दुःख विपदा जन-जीवन पर।
अब छोड़ व्याख्यान विपत्ति का
हो सचेत हम लें संज्ञान
तन धन समर्थन कर उनपर
बचाएँ उनका जीवन प्राण
बचाएं उनका जीवन प्राण।
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