आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं हार चुका हूँ

                
                                                         
                            मैं हार चुका हूँ,
                                                                 
                            
खुद को झुका चुका हूँ,
क्या था या और क्या
हो चुका हूँ।
न किसी से नजरें मिला पाता हूँ,
न ही किसी को दिल की बात बता पाता हूँ,
जब भी कोई पूछे
मेरे परिणाम के बारे में,
सिर्फ नजरें झुका लेता हूँ।
मैं हार चुका हूँ।
अपने आप से कई सवाल कर चुका हूँ,
न जाने कितनी गलतियां कर चुका हूँ,
यूं ही चुप न रहता हूँ मैं,
अब मैं थक चुका हूँ,
मैं हार चुका हूँ।
अब तो खुद से नजरें मिलाने में भी झिझकता हूँ,
बस दिन भर झूठी मुस्कान लिए फिरता हूँ,
लोगों में झूठी उम्मीदें जगाकर
उनका दिल दुखाता हूँ,
मैं क्या था और क्या हो चुका हूँ
"मैं हार चुका हूँ।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर