आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तनख्वा की सीनाजोरी

                
                                                         
                            हर महीने तनख्वा जो आती है,
                                                                 
                            
मुझे देख तकती है ओर मैं उसे देख

पास महंगाई जी चुराती है,
मानो GST के गले,
वरमाला पहन चिढ़ाती है

लो ताता लग गए खर्चों का
UPI online, Bachchan ji की आवाज सुना रही है
और IMPS, NEFT, RTGS, लोन के EMI भुना रही है

किसका पहले, किसका बाद में
कतार में प्राथमिकता,
चंचल आहट निद्रा भगा रही है

लेनदार अनेक, देनदार फाका
पड़ोसी दोस्तों से उधारी में,
रिश्तों में दरारों ने झांका

अगला पिछला कौन है
मुसीबत में जो कर दे,
टाट के पैबंद को, उजड़ने से ढाका

हाय रि किस्मत,
अब तो बची कुची जेब भी,
जेबकतरों ने लुटा जमकर
बटुआ को ही कर दी, रिश्वत में डाका

इसीलिए तनख्वा भी, ९ २ ११ बोलकर
अगले महीने फिर आऊंगी,
ये दिलासा दे, दे भगा.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर