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जुगनुओं की तरह टिमटिमाना

                
                                                         
                            रात, तू आज रुक जाना,
                                                                 
                            
मुझे तुझसे बातें ही तो करनी है,
थोडा ठहर जाना

तुम्हारा अंधेरा रूप
मुझे अच्छा लगता है,
तुम्हारी खामोशी में
कीट पतंगों जुगनुओं का
कर्कश आवाज़,
वीरानियत को चीर देता है,

काले घने तुम्हारे रूप में,
मैं समा जाता हूँ,
मैं अनगिनत करवटों में,
लिपट जाता हूँ

भोर तलक जो रुक जाती हो,
बहुत अहसान करती हो

सूरज की किरणों को,
तुमसे कोई शिकायत नहीं,
वे तो मुझे ही, जगाने आ जाती हैं

सपनों के रात भी, अजीब होते हैं,
ख्वाबों में तारे भी, गजब होते हैं,

ऐ रात तू फिर आना,
देर सवेर ही सही,
कुछ लोरियां सुनाना,
एक मीठी सी हवाओं में,
कुछ गुनगुनाना,
जुगनुओं की तरह टिमटिमाना,

मेरी आँखें जब बंद हों,
तो चुपके से माथा चूमकर,
मुझे तकते रहना।
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2 hours ago

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