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वहम आखिर दे ज़ख़्म

                
                                                         
                            जिंदगी में कुछ हसीन वहम भी, जरुरी हैं
                                                                 
                            
हमेशा खुबसुरत, हकीकत भी, कहाँ होती हैं

यू निकल पड़े कहीं दूर, किसी तलाश में,
न मालूम कौन सी मंजिल थी,
जो ढूंढते-ढूंढते पहुंची, हम तक

ये वहम हमें है, या हकीकत हमारी
जिंदगी हर लम्हा, खूबसूरत बनी हमारी
जब दिल से, याद आई तुम्हारी

यू मुद्दतों बाद हुई रूबरू तुमसे,
न जाने क्यों

जब पड़े शब्द तुम्हारे,
तुम्हारे ही जुबान से

यू लगा कोई महीन सी,
मुलायम, मखमली सी,
एक आवाज़ कुछ पुछती है,
ठहर ठहर

वोही आवाज़ पतली सी,
धीमी मगर,
कोई आहिस्ता चल रहा हो,
जमीं पर अगर

कितने बरस हो गए,
तुझे यू देखे बगैर

कितनी उम्मीदें पलट गए,
यूं सवर सवर

देखें जिसे नज़र कोई,
निरही टकटकी बंधे अगर

कुछ मौके थे, गुमनाम मगर,
वो पल अनजाने में है, कैद मगर

फिर वो भूले से ही,
क्यों न याद आए कभी,
जीवन बनी एक लंबी सफर

कोई अंदाजा भी नहीं मुझे,
पर हो रहा है यकीन मुझे,
की इस तरह जी लेते है,
हमारे ही भीतर बनके,
कोई भावनाएं प्यार अगर

हम समझ रहे थे, ए प्यार है,
पर पता देर से ही सही,
एक पकड़ा, एक येकिन

कमबख्त ए प्यार ही,
मुझे कर रही थी,
इस्तेमाल मगर

हंसी छुटी इत्मीनान रहा,
हमसे कोई खता न हुई,

वो तो इरादा,
प्यार को ही था
ओखली में सिर,
लेकिन हमारा ही था।
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8 महीने पहले

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