मैंने बचपन में एक बार मम्मी से पूछा था
मम्मी, मुझे भैया जैसा बनना कैसे है?
पता नहीं क्यों मम्मी ने चुप करा दिया।
मम्मी, मुझे जिम्मेदारी समझना है,
पर अधिकार भी जानना है।
मम्मी ने फिर हंस के टाल दिया।
मम्मी, मुझे त्याग, धैर्य, संघर्ष,
न्याय, समानता, करुणा
सब कुछ सीखना है
जो कुछ भी भैया हर दिन जीते हैं।
मम्मी ने फिर नजरअंदाज कर दिया।
भैया सबसे उलझते रहे दिन भर,
नहीं सिखाया किसी ने उन्हें — थक जाना।
कंधों पे बिठाया घर के सहारे के तरह उन्हें,
और वही कंधे हर साल थोड़ा और झुकते रहे।
कहते रहे कि भैया लड़का है, मजबूत है,
पर अपेक्षाओं के वजन से
उनके हाथ मुझसे भी ज्यादा कठोर हो गए थे।
चेहरा जवान था,
पर आँखें समय से पहले बूढ़ी हो गई थीं।
समाज ने उन्हें व्यक्ति नहीं, भूमिका बना दिया।
एमिल दुर्खीम कहते हैं —
समाज के नियम व्यक्ति से बड़े हो जाते हैं।
और मेरे भैया,
अपने ही जीवन में छोटे कर दिए गए।
टैल्कॉट पार्सन्स ने इसे भूमिका-निर्वाह कहा,
जहाँ व्यक्ति से पहले कर्तव्य खड़ा कर दिया जाता है।
मेरे घर में भी
भैया का नाम बाद में लिया गया,
उनसे उम्मीदें पहले रख दी गईं।
और अगर लड़के मजबूत होते हैं,
तो भैया को कमजोर पड़ने का अधिकार क्यों नहीं मिला?
अगर पुरुष रोते नहीं,
तो उनकी सूखी आँखों में जमा नमक कौन देखेगा?
भैया जिम्मेदारियों में गुम रहे,
और मैं किताबों में।
उन्हें कमाकर लाना कहा,
और मुझे सपने देखना।
मेरे हिस्से भविष्य आया,
उनके हिस्से परिवार।
नहीं सिखाया उन्हें मन के बारे में,
जैसे कि भावनाएं कोई दोष हों।
नहीं सिखाया कि उदासी कैसे कही जाती है,
कहते रहे कि ये लड़कियों की बात है।
इसलिए वो हँसते रहे,
जबकि भीतर से हर दिन थोड़ा टूटते रहे।
ये भेदभाव आखिर में उनके साथ क्यों?
आर. डब्ल्यू. कॉनेल ने कहा था —
मर्दानगी भी सत्ता की रचना है,
जिसमें पुरुष भी घायल होते हैं।
मैंने यह किताबों में पढ़ा,
पर उसे घर में जीते देखा।
पियरे बोरदियू ने इसे प्रतीकात्मक हिंसा कहा,
जहाँ अन्याय सामान्य लगने लगता है।
शायद इसलिए किसी ने नहीं देखा
कि भैया की चुप्पी भी एक चीख थी।
उन्हें भी जानना था कि डर कैसा लगता है।
उन्हें भी अपने आँसू
किसी अपने के सामने बहाना सीखना था।
पर उन्होंने आँसू नहीं बहाए,
बस रातों में करवटें बदलीं।
उन्हें भी सुननी थीं करुणा और समानता की बातें,
उन्हें सिर्फ कर्तव्य और संघर्ष की बातें क्यों बताई?
क्यों हर कहानी में उन्हें योद्धा बनाया,
इंसान क्यों नहीं रहने दिया?
क्यों उन्हें साहस
और मुझे संवेदनशीलता सिखाई गई?
उन्हें भी संवेदनशीलता सीखनी थी।
उन्हें भी किसी के कंधे पर सिर रखकर
थोड़ा रो लेना था।
महात्मा गांधी ने कहा था —
सच्ची शक्ति कठोरता में नहीं, करुणा में होती है।
पर भैया को कठोर रहना सिखाया गया,
इसलिए वो मजबूत दिखे,
मगर भीतर से अकेले रह गए।
बुद्ध ने सिखाया —
दया ही मनुष्य का सर्वोच्च धर्म है।
पर किसने भैया पर दया की?
स्वामी विवेकानंद ने कहा —
जो दूसरों के लिए जीता है, वही सच में जीता है।
पर जो हमेशा दूसरों के लिए जीता रहे,
वो खुद कब जीता है?
उन्हें भी जानना था कि
घर में रिश्ते आदेश से नहीं, संवाद से संभलते हैं।
ये राज भैया को क्यों नहीं बताया?
क्यों उन्हें सिर्फ कमाने की भाषा दी गई,
प्यार की नहीं?
उन्हें भी कभी अपने लिए जीना था,
त्याग सिर्फ उनके हिस्से क्यों आया?
जॉन रॉल्स कहते हैं —
न्याय वही है
जहाँ अवसर और बोझ दोनों बराबर बंटें।
पर घरों में अक्सर
अवसर छोटे भाई को मिलते हैं,
और बोझ बड़े भाई को।
अमर्त्य सेन कहते हैं —
विकास वही है
जहाँ व्यक्ति अपनी क्षमता जी सके।
पर भैया अपनी क्षमता नहीं जी पाए,
बस अपनी जिम्मेदारियाँ जीते रहे।
अब भैया नौकरी भी कर लेते हैं,
और घर का भार भी संभाल लेते हैं।
मगर वो?
बस चुप रहना सीख पाए।
चेहरे पर हिम्मत,
भीतर अनकहा दर्द लिए।
सबके लिए खड़े रहे,
अपने लिए कभी नहीं।
नारीवाद ने स्त्री की पीड़ा बताई,
और सही बताया।
पर मानवतावाद कहता है —
हर दबाव, हर अन्याय,
चाहे जिस पर हो, मिटना चाहिए।
समाजवाद कहता है —
बोझ बराबर बंटे।
उदारवाद कहता है —
हर व्यक्ति को चुनाव मिले।
अस्तित्ववाद कहता है —
मनुष्य भूमिका नहीं, स्वतंत्र चेतना है।
पर मेरे भैया को
बस एक भूमिका बनाकर छोड़ दिया गया।
आज भी सोचता हूँ कि
अगर तुमने उन्हें भावनाएं जीना सिखाया होता,
अगर तुमने उन्हें खुद को चुनना सिखाया होता,
अगर तुमने उन्हें हार जाना सिखाया होता,
अगर तुमने उन्हें रो लेना सिखाया होता,
तो शायद वो आज भी हँसते,
सिर्फ मुस्कुराते नहीं।
शायद वो जीते,
सिर्फ निभाते नहीं।
शायद वो अपने जैसे पूरे होते,
अधूरे नहीं।
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