धँसी आँखें, दुर्बल शरीर,
मैले कपड़ों के साथ,
खुले आसमान के नीचे,
आँखों में थोड़ी उम्मीद की नमी लिए
एक नब्बे वर्ष का बुजुर्ग
मिट्टी से दीपक बना रहा था।
मैंने उसके सृजन को देखा—
शुरू से अंत तक,
किसी मासूम बच्चे की तरह
सृष्टि का खेल रच रहा था।
उसने चाक पर रखी
नरम, मुलायम, गीली मिट्टी,
फिर एक मामूली छड़ी से
चाक को तेज घुमाया।
अब दोनों हाथों से स्पर्श दिया—
मिट्टी उनके हाथों से यूँ लिपट गई,
मानो माँ के हृदय से लगा
कोई नवजात शिशु हो।
घूमती चाक पर
धीरे-धीरे मिट्टी
जीवित आकार लेने लगी,
और एक सुंदर दीपक
जन्म लेने लगा।
मैं अचंभित रह गया—
नब्बे साल के उस बुजुर्ग ने
प्रेम को अभी भी जिंदा रखा था।
चाक से उतारकर
धूप में सूखते दीपक
मानो नन्हे सूरज बनकर
अपने सृजनहार को निहार रहे हों।
मैंने पूछा— “बाबा, हो गया?”
वृद्ध ने हँसकर कहा—
“अभी आग की भट्टी में डाले जाएँगे,
दुनिया को रोशनी देने से पहले
खुद को जलना होता है,
बिना दर्द सहे
सच्चा प्रेम नहीं मिलता।”
-हितेश रंजन दे
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