उतर रहा है चाँद धीरे धीरे,
बहकर आए प्रवाल को लेने,
देखना लेकर इसे ये जायेगा,
खुद को फिर ये सजाएगा,
जाकर सागर के ऊपर,
उसके ही लाये प्रवाल को बताएगा,
सागर फिर इसे देखकर, लालायित होके इसे उससे मांग लेगा,
कहेगा हक नहीं है तुम्हारा इसके ऊपर,
तुम तो तारो, सितारो से ढंके हो,
इस प्रवाल की सजावट से परे हो,
पर नहीं चांद कहेगा,
वो सागर के ऊपर और भी बढ़ेगा,
ले लेगा वो इस धरती की उषा की लाली,
जो प्रवाल के संपर्क में आने से हो जाती है बलवाली,
ये प्रवाल ही तो है जो इस उषा लाली को,
और भी बढ़ा देता है,
गोधूली बेला से पूरे जगत को चमका देता है।
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