क्यों शार्दुल सिंह तुम आये व अपने
कदमों के निशान पीछे छोड़ नहीं आए,
इस तरह से आना क्या कहलाता है तुम्हारा,
अरे नहीं गजराज सिंह ऐसा नहीं हो सकता
में जहा से गुजरु वहां मेरे निशाँ नहीं रहे,
मेरे निशा तो यहां के आवागमन को प्रभावित करते है,
व जब तक में वापिस नहीं निकलता,
तब तक तो सब रुके हुए रहते है,
भय बहुत ही सुंदर बन पड़ा है,
क्योंकि शार्दुल सिंह ने अब खुद के ही,
कदमों के निशानों को मिटाना शुरू करा है
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