इस पेड़ कि छांव मे क्षणिक भर में विश्राम कर लूं,
लद कद है पर है कही ना कही क्लांति,
थोड़ा इसका बोझ में अपने ऊपर धर लूं,
दोनों है पर है खड़े, मकसद से कभी नहीं पीछे हटे,
पत्थर भी बहुत सहे है, व बहुत कुछ है गंवाया भी,
एक दूसरे को आज सहारा देकर फिर में चल लूं,
कानो में घुल गया है आज जहर मेरे,
मीठी कोयल दिखाई नहीं दी,
ये पेड़ बोले या फिर में कुछ बोल लूं,
कौन आया, कौन गया है पथ ये नादान,
तुम्हारे कर्म का फल तुम्हे ही है तोड़ना,
आज आम उगाना, कल बबुल छोड़ लू।
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