यह कौन जा रहा है मेरा गाँव छोड़ के,
आँखों ने रख दिए हैं समंदर निचोड़ के।
हमसे न पूछ रात की खामोशियों का दुख,
सोए हैं अपने ज़ख्म बिछाने ओढ़ के।
साए भी आज अपने मकाँ ढूँढने लगे,
दीवार रो पड़ी है पुराना मकाँ तोड़ के।
मिलना अगर न हो तो कोई बात भी नहीं,
बस याद रखना मुझको कभी अपना सोच के।
लाला' तमाम शहर में अब ढूंढता है क्या,
सब ले गया वो शख़्स तेरा शहर छोड़ के।
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