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तुम्हारे बाद जो बचा

                
                                                         
                            जो लम्हे थे तेरे आगे
                                                                 
                            
हौसला लेने के,
उनमें भी अब
मुझे अपनी कमजोरियाँ महसूस होने लगी हैं।

पहले तेरे सामने
मैं अपने सारे डर रख दिया करता था,
जैसे कोई मुसाफ़िर
सफ़र की थकान
किसी पेड़ की छाँव में रख देता है।

अब वही छाँव
मुझसे धूप का पता पूछती है।

मैं रुख़सत न रह सकता था
तेरी पनाहों से—
क्योंकि मेरे लिए
तेरी पनाह कोई जगह नहीं थी,
वह मेरा आख़िरी यक़ीन थी।

मगर तुम
मुझे वक़्त के साथ बदलती चली गईं।

इतनी ख़ामोशी से
कि तुम्हारे बदलने की आवाज़ भी न हुई,
और मैं देर तक
उसी पुराने तुम्हें
नई आँखों में तलाशता रहा।

तुम्हारे जाने के बाद
मुझे पता चला
कि विरह कोई दूरी नहीं होता—
वह तो वह जगह है
जहाँ इंसान हर रोज़
किसी के पास जाने की कोशिश करता है
और हर रोज़
थोड़ा और दूर हो जाता है।

अब रातें मुझ पर
पहले जैसी नहीं उतरतीं।

पहले रात आती थी
तो तुम्हारी याद लाती थी,
अब तुम्हारी याद आती है
तो रात हो जाती है।

चाँद खिड़की पर ठहरता है
और मैं उससे नज़रें चुरा लेता हूँ—
कहीं वह पूछ न बैठे
कि जिस चेहरे को तुम
चाँद कहा करती थीं,
उस चेहरे पर अब
इतनी रात क्यों है?

तुम्हें मालूम भी है
तुम्हारे बाद
कितनी चीज़ें अनाथ हो गईं?

वह रास्ता
जिस पर तुम्हारे साथ चला था,
वह मौसम
जिसमें तुम्हारा हाथ थामा था,
वह गीत
जिसे सुनकर तुम्हारी आँखें हँसती थीं—
सब अब भी वहीं हैं,
बस उनमें
तुम नहीं हो।

और सबसे ज़्यादा
मैं ख़ुद में नहीं हूँ।

तुम्हारे जाने से
मेरा कोई एक हिस्सा नहीं टूटा,
बल्कि मेरे भीतर का वह आदमी चला गया
जो प्रेम पर विश्वास करता था।

अब कोई पूछता है—
“कैसे हो?”

तो मैं मुस्कुरा देता हूँ।

क्योंकि कुछ दर्द
बताए नहीं जाते,
सिर्फ़ जिए जाते हैं।

मैंने तुम्हें भूलने की
बहुत कोशिश की है,
मगर यादों का भी अपना स्वभाव होता है—
जितना उन्हें दरवाज़े से निकालो,
उतनी ही चुपचाप
खिड़की से लौट आती हैं।

कभी-कभी सोचता हूँ,
काश तुमने मुझे छोड़ा ही न होता,
काश मैं तुम्हारी आँखों में
धीरे-धीरे अजनबी न हुआ होता,
काश वक़्त ने
हमारे बीच इतना कुछ न बदला होता।

मगर “काश” भी कितना निर्दयी शब्द है—
एक ऐसा घर
जिसमें इंसान रह तो सकता है,
मगर लौट नहीं सकता।

अब अगर तुम लौट भी आओ,
तो शायद मैं पहले जैसा न रहूँ।

मेरी प्रतीक्षा ने
मुझसे मेरा बहुत कुछ ले लिया है।

फिर भी,
मेरे भीतर एक दरवाज़ा
अब तक बंद नहीं हुआ—

शायद मोहब्बत की यही सबसे बड़ी त्रासदी है;
जिसे हम खो देते हैं,
उसके लिए भी
दिल में एक जगह बची रहती है।

तुम लौटो या न लौटो,
मैं अब तुम्हें पुकारूँगा नहीं।

बस कभी किसी ख़ामोश रात
जब तुम्हें अचानक
बिना वजह उदासी घेर ले,
तो समझ लेना—

कहीं बहुत दूर
कोई अब भी
तुम्हारी याद में जाग रहा है।

कोई,
जिसने तुम्हें खोकर
तुम्हें छोड़ना नहीं सीखा।

कोई,
जिसकी रूह ने
तुम्हारी रुख़सती तो देख ली,
मगर तुम्हारे बिना
जीना अब तक नहीं सीखा।

और शायद…

विरह यही है—
जिसे लौटकर आना नहीं था,
उसके लौटने की उम्मीद में
पूरी उम्र
दरवाज़ा खुला रखना।


 
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एक घंटा पहले

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