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वो चल रहा

                
                                                         
                            रात्रि की राह सा
                                                                 
                            
त्रिकाल के प्रहार सा
समस्त लोकलाज को निहारता
वो चल रहा

अग्नि तेज़ क्रोध सा
सिखा शुक्ल स्वेत सा
निशा के श्याम केश को पसारता
वो चल रहा

दिशाविहीन देेेश सा
रक्त लिप्त नेत्र सा
किसी गुफा में प्रेत को प्रताड़ता
वो चल रहा

अनंत नाग शेष सा
वो भैरवों के वेष सा
विशुद्ध वीतराग को विगड़ता
वो चल रहा

अटूट प्रेम पास सा
अपूर्ण स्वर्ग आस सा
मृत्युजीत प्रास को प्रलेपता
वो चल रहा


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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