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तन्हाई

                
                                                         
                            दहशत के इस माहौल में, तुझ से दो बातें करने का मन करता है
                                                                 
                            
छूट गयी थी जो बातें, अब तुझको समझाने को जी करता है।।

दर बदर शोर है खौफ़नाक सा मंजर है, मन मेरा घबराता है
कैसी होगी तू, तेरा हाल जानने का मन करता है।।

एक बार फिर तेरा हाथ पकड के, दर्द बया करने का मन करता है
पश्चाताप के आँसू बहते, चरणों पर शीश झुकाने को मन करता है।।

सारे रिश्ते छूट गये थे, फिर क्यों तेरी यादो के मेले लगते हैं
तन्हाई के इस दौर में, तेरी खोज खबर करने को क्यो हम पागल -2 फिरते हैं ।।

तन्हाई ने मुझे सिखाया, रिश्ता जिस्म का मोहताज नहीं था
इसीलिए दूर हुआ में जब सबसे, तन्हाई ने तेरा नाम सुनाया ।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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