आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल्ली दूर बहुत है

                
                                                         
                            लोग कह रहे हैं दिल्ली दूर बहुत है,
                                                                 
                            
ये है शहर पुराना मशहूर बहुत है

यादों का एक काफिला यहां आ के थम गया,
गर्दिशों में गुम हुआ पर नूर बहुत है

हम चाह के भी पास उसके जा नहीं सकते,
मजबूर हैं हम और वो मगरूर बहुत है

फासलों में भी छुपा है एक फलसफ़ा,
वो चाहें भी तो मिलना दस्तूर बहुत है

दिल की सड़क पे पसरा है सन्नाटा बेहिसाब,
यादों का यहां शोर जो भरपूर बहुत है

है टूटे हुए दिल की रवानी यही कहती
हर अश्क में छुपा हुआ एक नूर बहुत है

माना कि छोड़ कर गए वो बीच राह में
पर आज भी उनके लिए गुरूर बहुत है

अब इश्क़ की बस्ती में हैं वीरानियां सही,
वीराने में भी मिल रहा सुरूर बहुत है

अपनी ही तन्हाइयो से बात कर ‘हृदय’,
इस खामोशी में भी उनका हुज़ूर बहुत है
-हरवंश हृदय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर