लोग कह रहे हैं दिल्ली दूर बहुत है,
ये है शहर पुराना मशहूर बहुत है
यादों का एक काफिला यहां आ के थम गया,
गर्दिशों में गुम हुआ पर नूर बहुत है
हम चाह के भी पास उसके जा नहीं सकते,
मजबूर हैं हम और वो मगरूर बहुत है
फासलों में भी छुपा है एक फलसफ़ा,
वो चाहें भी तो मिलना दस्तूर बहुत है
दिल की सड़क पे पसरा है सन्नाटा बेहिसाब,
यादों का यहां शोर जो भरपूर बहुत है
है टूटे हुए दिल की रवानी यही कहती
हर अश्क में छुपा हुआ एक नूर बहुत है
माना कि छोड़ कर गए वो बीच राह में
पर आज भी उनके लिए गुरूर बहुत है
अब इश्क़ की बस्ती में हैं वीरानियां सही,
वीराने में भी मिल रहा सुरूर बहुत है
अपनी ही तन्हाइयो से बात कर ‘हृदय’,
इस खामोशी में भी उनका हुज़ूर बहुत है
-हरवंश हृदय
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