था एक परिंदा जो छोड़ गया अपना बसेरा,
हर रिश्ते नाते तोड़ गया परिंदा।
हर डाल उसको भाता था,
हर गीत वो धुन मे गाता था।
हर सुबह उसका प्यारा था,
चांद के संग का एक वो तारा था।
उसके पेड़ बड़े उदास है,
अब करते नही किसी से बात है।
अब उनको गीत कोई सुनाता नही,
या फिर ये कहो कि उनको अब कुछ भाता नही।
छोड़ गया वो परिंदा,हर रिश्ते नाते तोड़ गया परिंदा।
जवानी के दो पल जी लिया,
अपनो के दिए जख्मों को वो खुद से ही सी लिया।
साथ खड़े अपनो ने आसियाने में उसके आग लगाया,
भला वो वापस आता कैसे?
था एक परिंदा अब वो ऐसे ही अपनो से रिश्ता निभाता कैसे?
सैयद इसी लिए छोड़ गया परिंदा सब रिश्ते नाते तोड़ गया परिंदा।।
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