सुनो, ज़रा फ़िर से मुस्कुरा दोगी?
मेरे इश्क़ का तुम अब,
और इम्तेहाँ क्या लोगी
मेरी मोहब्बत के एवज में
और मुझे तुम क्या दोगी
ये दिल इतना ही तो कह रहा है कि
सुनो, ज़रा फ़िर से मुस्कुरा दोगी?
तुम तो मुझको जानती हो ना
मेरी हर गुज़ारिश मानती हो ना
मैं सुर्ख़ शोलों में जल रहा हूँ
तुम-बिन मैं तन्हा मचल रहा हूँ
क्या मेरी बेचैनियों को
फ़िर मुझसे तुम चुरा लोगी
ये दिल इतना ही तो कह रहा है कि
सुनो, ज़रा फ़िर से मुस्कुरा दोगी?
हो खामोश क्यूँ, कुछ तो कहो ना
इतना ही कह दो कि तुम मेरी हो ना
जो दिल में है बात उसे कर लो क़ुबूल तुम
जो कहती हैं आँखें वो ज़ुबां से दो बोल तुम
क्या अपने गुरूर से मेरे प्यार को हरा दोगी
ये दिल बस इतना ही तो कह रहा है कि
सुनो, ज़रा फिर से मुस्कुरा दोगी?
-यादवजी कहिन
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