है झूठ ही मेरी रग-रग में
है सच्चा ये जहान सारा।
है ज़ालिम ये दुनिया क़ातिल
मैं क़ैद में इसकी बेचारा।।
है जुदा-जुदा मेरी हस्ती या
जुदा है ये सारी बस्ती
मैं रोता तो दुनिया हंसती
लगता मैं जग में बंजारा
है झूठ ही मेरी रग-रग में
है सच्चा ये जहान सारा।
है ख़फ़ा मेरी हस्ती मुझसे
मैं रूठा बैठा हूँ खुद से
न भाये खुशियाँ जीवन की
मैं जलता बुझता अंगारा
है झूठ ही मेरी रग-रग में
है सच्चा ये जहान सारा
है ज़ालिम ये दुनिया क़ातिल
मैं क़ैद में इसकी बेचारा।।
-यादवजी कहिन
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