हर खुशी रूठ जाती, तुम्हारे बिना,
रात सहमी-सी कटती, तुम्हारे बिना।
सब समझते हैं खुशहाल हूँ मैं मगर,
ज़िंदगी रोज़ उजड़ती, तुम्हारे बिना॥
हर दिशा में अंधेरा, तुम्हारे बिना,
सूना-सूना किनारा, तुम्हारे बिना।
लोग कहते हैं महलों का राजा हूँ मैं,
मन भटकता बंजारा, तुम्हारे बिना॥
कोई मौसम न भाता, तुम्हारे बिना,
गीत लब पे न आता, तुम्हारे बिना।
जग की महफ़िल में हँसता हूँ सबके लिए,
ज़ख्म दिल का सताता, तुम्हारे बिना॥
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