आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"संस्कृति ऐसी हुआ करती थी"

                
                                                         
                            अम्मा की वो मीठी लोरी,
                                                                 
                            
ताऊ की हर बात रखना।
चौपालों पर जगमगाती,
सादगी की सौगात रखना।।

चूल्हे की वो पहली रोटी,
कंधे का वो गमछा रखना।
आँगन में अपनों के संग,
बीता हर इक लम्हा रखना।।

महलों को तुम लाख सजा लो,
पुरखों का वो सूप रखना।
उस पर थोड़ा अन्न सजाकर,
घर का कच्चा रूप रखना।।

छत-छज्जे भले बदल लेना,
पीपल की वो छांव रखना।
उस पर बैठे बुजुर्गों का,
स्नेह और लगाव रखना।।

रखना वही पुरानी बातें,
पीढ़ी को सिखलाना रे।
रिश्ते कैसे जुड़े रहें,
सबको यह बतलाना रे।।

माटी का वो सोंधापन हो,
महकता सा चंदन रे।
भागमभाग की दुनिया में,
अपना सा अपनापन रे।।

पूछेगा जो कोई हमसे,
किस्सा सब सुनायेंगे।
अपनी मिट्टी की खुशबू को,
आगे हम बढ़ाएंगे।।

पुरखों की इस धरोहर को,
सच कर हम दिखायेंगे।
देख हमारी संस्कृति को,
सबको यह बताएंगे—
कि जीवन ऐसा हुआ करता था।।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर