अम्मा की वो मीठी लोरी,
ताऊ की हर बात रखना।
चौपालों पर जगमगाती,
सादगी की सौगात रखना।।
चूल्हे की वो पहली रोटी,
कंधे का वो गमछा रखना।
आँगन में अपनों के संग,
बीता हर इक लम्हा रखना।।
महलों को तुम लाख सजा लो,
पुरखों का वो सूप रखना।
उस पर थोड़ा अन्न सजाकर,
घर का कच्चा रूप रखना।।
छत-छज्जे भले बदल लेना,
पीपल की वो छांव रखना।
उस पर बैठे बुजुर्गों का,
स्नेह और लगाव रखना।।
रखना वही पुरानी बातें,
पीढ़ी को सिखलाना रे।
रिश्ते कैसे जुड़े रहें,
सबको यह बतलाना रे।।
माटी का वो सोंधापन हो,
महकता सा चंदन रे।
भागमभाग की दुनिया में,
अपना सा अपनापन रे।।
पूछेगा जो कोई हमसे,
किस्सा सब सुनायेंगे।
अपनी मिट्टी की खुशबू को,
आगे हम बढ़ाएंगे।।
पुरखों की इस धरोहर को,
सच कर हम दिखायेंगे।
देख हमारी संस्कृति को,
सबको यह बताएंगे—
कि जीवन ऐसा हुआ करता था।।
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