मिट्टी की खुशबू और खेतों की छाँव से,
जुड़े रहे हमेशा वो अपने ही गाँव से।
पर्दे पर कभी गुस्सा तो कभी आँखों में नमी,
उनकी हर अदा में दिखती थी रूह की ज़मीन।
बेसहारा किसानों का दर्द सीने से लगाया,
फिल्मी चकाचौंध से दूर, ज़मीन पर वो आया।
'नटसम्राट' का वो संवाद आज भी है गूँजता,
सच्चे अभिनय का सूरज हर दिल में है चमकता।
न कोई अहंकार, न ही शोहरत का गुरूर,
आम इंसान की खातिर धड़कता था वो नूर।
सलामत रहे उनकी यादों का यह सफ़र,
'नाना' दिलों में रहेंगे हमारे उम्र भर।
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