"अमर वजूद"
हमारे बाद भी तारीख़ में किरदार ज़िंदा हैं,
रग-रग के लहू में आज भी आसार ज़िंदा हैं।
चले जाएँगे तो क्या हुआ इस बज़्म-ए-दुनिया से,
हमारे नाम से ही आज भी दरबार ज़िंदा है!
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