आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उलझे अल्फ़ाज़

                
                                                         
                            तुम भी उलझे , हम भी उलझे
                                                                 
                            
न तुम सुलझे , न हम सुलझे
उलझी हैं जुल्फें तेरी , उलझे हैं अल्फ़ाज़ मेरे
उलझे थे अंत तेरे , उलझें थे आगाज़ मेरे
तड़पी थी आवाज़ तेरी, तड़पे थे सुर साज मेरे
रूठे थे होठ तेरे ,रूठे थे गीत ग़ज़ल मेरे
भीगी भीगी थीं आंखें तेरी, तस्वीर तुम्हारी थीं सामने ओझल मेरे
बादल गई है ताबीर तेरी बाहों की ,आज भी है मुझको इंतज़ार तेरी राहों की
दौड़ी दौड़ी आ जाना फिर , कुचल चुका हूं उन अफवाहों को

हरिकेश यादव काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर