तुम भी उलझे , हम भी उलझे
न तुम सुलझे , न हम सुलझे
उलझी हैं जुल्फें तेरी , उलझे हैं अल्फ़ाज़ मेरे
उलझे थे अंत तेरे , उलझें थे आगाज़ मेरे
तड़पी थी आवाज़ तेरी, तड़पे थे सुर साज मेरे
रूठे थे होठ तेरे ,रूठे थे गीत ग़ज़ल मेरे
भीगी भीगी थीं आंखें तेरी, तस्वीर तुम्हारी थीं सामने ओझल मेरे
बादल गई है ताबीर तेरी बाहों की ,आज भी है मुझको इंतज़ार तेरी राहों की
दौड़ी दौड़ी आ जाना फिर , कुचल चुका हूं उन अफवाहों को
हरिकेश यादव काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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