थे मेरे अरमां उनके पहलू में रहने की ,
मगर तकदीर का सहारा न मिला
हम अपनी ही बस्ती में बहाते रहे अश्क
क्योंकि उनके महफ़िल ए बज़्म में जाने का उनका इशारा न मिला ।
हरिकेश यादव काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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