तू नहीं आयेगा तो क्या हुआ
फिर भी इन्तजार तेरा ही हर जनम में करते रहेंगे
इस जनम में हो जाओ उसी की जो तुम्हें प्यारा हो
अगले जनम में सिर्फ़ मेरे लिए आना
शिक़ायत मुझसे थी तो मेरी ही शिक़ायत करते
मेरे ज़ाम का ज़िक़्र क्यों छेड़ दिया
मेरी शिकायतों का फैलाव बस सिर्फ़ एक अल्फ़ाज़ था
तूने तो पूरी क़िताब ही लिख डाली
मुझे अब आइने पर भी इतवार न रहा
क्योंकि ये सिर्फ़ टूटना ही नहीं बल्कि चुभना भी जानते हैं
फूलों की भी दोस्ती अच्छी नहीं होती
क्योंकि ये तो अपनी दोस्ती सिर्फ़ कांटों से निभाना जानते हैं
तुझे लिखने से पहले ही लिखना छोड़ दिया मैंने
क्योंकि तेरे हर जिस्म की तारीफ़ लिखने में सात जनम भी कम पड़ जाएंगे
तुमने अपनी इक उंगली क्या उठाई
ज़माने भर की उंगलियां हम पर उठने लगी
हमारी शिकायतें तो तुमने ज़माने भर से कर दीं
पर हम से कब करोगे
अगर तुममें जीतने की ज़िद है
तो हममें भी हारने का हुनर है
माना कि तुम बहुत ही नायाब हो
तुम जैसा और कोई हो नहीं सकता इस धरा पर
पर तुम्हारा अंदाज़ ए बिछड़ना बहुत तड़पता है
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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