मैं अलंकार हूं
काव्य का श्रृंगार हूं
मैं सुशोभित करता हूं सर्वप्राचीन वाङ्मय ऋग्वेद की ऋचाओं को
मैं मनोहारी और आकर्षक बनाता हूं साहित्य सम्पूर्ण की काव्य फिज़ाओं को
मैं काव्य लता के कुंज को गुंजरित करता हूं
मद - मत्त भ्रमरों को चंचल बनाता हूं
खिले हुए कमलों को शनै:शनै: हिलाता हूं
पुष्प पराग को प्रेम रस पिलाता हूं
मन्द मन्द गति से चलने वाली सुगंध समीर को गीत संगीत सिखाता हूं
मैं अलंकार हूं
काव्य का श्रृंगार हूं
मैं अंगों का अंगों से आलिंगन कराता हूं
काम भावना को प्रबल बनाता हूं
प्रेम भावना को परिष्कृत करता हूं
रूप सौंदर्य को पुरस्कृत करता हूं
मैं अलंकार हूं
काव्य की मुस्कान हूं
शोभाधायक धर्म हूं
कवियों का मर्म हूं
काव्य की आराधना हूं
कवियों की साधना हूं
पाठकों की उपासना हूं
मैं अलंकार हूं
काव्य का श्रृंगार हूं
मैं साहित्य की श्रीवृद्धि हूं
रसों के भावों की बुद्धि हूं
मैं अलंकार हूं
काव्य का श्रृंगार हूं
मैं अनुप्रास हूं
हर ध्वनि का विश्वास हूं
मैं यमक हूं
अर्थों की चमक हूं
मैं श्लेष हूं
एक ही अस्तित्व का कई भेष हूं
मैं उपमा हूं
कभी चांद तो कभी आसमां हूं
मैं उत्प्रेक्षा हूं
संभावनाओं की अपेक्षा हूं
मैं संदेह हूं
कवियों के संशय का स्नेह हूं
मैं भ्रांतिमान हूं
कवि कल्पना का अभिमान हूं
मैं दीपक हूं
अप्रस्तुत और प्रस्तुत का द्योतक हूं
मैं विभावना हूं
हेतु विना हूं
मैं विशेषोक्ती हूं
कवि मर्म की सूक्ति हूं
मैं दृष्टांत हूं
बिम्ब प्रतिबिंब भाव का विधान हूं
मैं अलंकार हूं
काव्य का श्रृंगार हूं ।
हरिकेश यादव काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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