इक कशिश थी दिल में मेरे,संग तेरे दुनिया बसाने की ।
खोया- खोया रहता था मैं यादों में तेरी , थी नहीं प्रवाह ज़माने की ।
अश्कों की धारा बहती है , गम में तेरे जाने की ।
तनहाई का आलम है ऐसा कि कोशिश भी न कर पाऊं तुझे भुलाने की ।
हरिकेश यादव, काशी हिंदू विश्वविद्यालय,वाराणसी ।
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